Post Page Advertisement [Top]

Mohabbat Bhari Ghazal | 15 अशआर की खूबसूरत प्यार भरी ग़ज़ल

इश्क़ जब रूह में उतरता है तो ज़ुबान ख़ामोश हो जाती है और दिल अपनी बात नज़्मों व ग़ज़लों के ज़रिए बयां करने लगता है। उर्दू और हिंदी शायरी में Mohabbat Bhari Ghazal का स्थान हमेशा से सबसे बुलन्द और दिलकश रहा है। सच्ची चाहत, पहली मुलाक़ात की झिझक, महबूब की यादों का मीठा सुरूर और प्रेम में मिलने वाला असीम सुकून जब एक शास्त्रीय बहर में बंधते हैं, तो वह सीधे सुनने और पढ़ने वाले के दिल में उतर जाते हैं।

इंटरनेट पर अक्सर प्यार और मोहब्बत की सिर्फ दो-तीन पंक्तियाँ ही बिखरी हुई मिलती हैं, लेकिन एक सच्चा अदबी प्रेमी हमेशा एक मुकम्मल और विस्तृत Hindi Ghazal पढ़ना चाहता है। इसीलिए आज हम आपके लिए लेकर आए हैं पूरे 15 अशआर (ठीक 30 मिसरे) की एक मौलिक, ताज़ा और बेहद भावनात्मक रचना। इसका पहला शेर मतला (Matla) के रूप में दोनों मिसरों में क़ाफ़िया और रदीफ़ के साथ सजाया गया है, जबकि आख़िरी 15वाँ शेर मक़ता (Maqta) है जिसमें शायर का तख़ल्लुस “अफ़सर” (Afsar) अत्यंत नज़ाकत और स्वाभाविकता से पिरोया गया है।

इस ग़ज़ल में सच्ची मोहब्बत से लेकर आँखों की बातें, बिना कहे प्यार समझ लेना, इंतज़ार, दूर रहकर भी क़रीब महसूस करना और उम्र भर साथ निभाने की आरज़ू जैसे सभी खूबसूरत एहसासों को शामिल किया गया है। पाठकों की सहूलियत के लिए इसे हिंदी (Devanagari), उर्दू (اردو) और Hinglish (रोमन) तीनों रूपों में नीचे दिए गए इंटरैक्टिव टैब में प्रस्तुत किया गया है।

शीर्षक (Title)
Mohabbat Bhari Ghazal
कुल अशआर
15 अशआर (30 मिसरे)
बहर (Meter)
बह्र-ए-हज़ज सालिम
रदीफ़ (Radif)
के पहलू में / کے پہلو میں
क़ाफ़िया (Qafiya)
क़रार, बहार, ख़ुमार...
तख़ल्लुस (Pen-Name)
अफ़सर / Afsar / افسر

📋 पूरी 15 अशआर की मोहब्बत भरी ग़ज़ल कॉपी करें

वर्तमान में चयनित भाषा टैब (हिंदी, उर्दू या Hinglish) की संपूर्ण 15 अशआर ग़ज़ल एक क्लिक में क्लिपबोर्ड पर सेव करें

शेर 1 — मतला (सच्ची मोहब्बत) #01 / 15

मिला है दिल को यूँ आ कर क़रार उस के पहलू में, हुई बेदार फिर से इक बहार उस के पहलू में।

शेर 2 — पहली मुलाक़ात #02 / 15

वो पहली दीद की लज़्ज़त अभी तक याद है दिल को, छलकता ही रहा मीठा ख़ुमार उस के पहलू में।

शेर 3 — आँखों की मोहब्बत #03 / 15

निगाहों से निगाहों ने हज़ारों दास्ताँ कह दीं, मिला जब भी हमें हुस्न-ए-निखार उस के पहलू में।

शेर 4 — दिल में बसी याद #04 / 15

ज़माना भूल कर हम ने बसर की ज़िंदगी सारी, हसीं लम्हे किए सारे गुज़ार उस के पहलू में।

शेर 5 — ख़ामोश मोहब्बत #05 / 15

जहाँ पर लफ़्ज़ ख़ामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं, बसाया इश्क़ ने अपना दयार उस के पहलू में।

शेर 6 — प्रेम में सुकून #06 / 15

भटकती रूह को आख़िर पनाह-ए-ज़िंदगी बख़्शी, सुकूने-जाँ हुआ जब आशकार उस के पहलू में।

शेर 7 — दिल की धड़कन #07 / 15

धड़कता है मिरा दिल भी उसी के सुर में अब हर पल, हुई साँसें मिरी जाँ बे-शुमार उस के पहलू में।

शेर 8 — ख़ास इंसान की चाहत #08 / 15

दो आलम की ख़ुशी जिस पर लुटाने की तमन्ना थी, किया सब कुछ वही दिल ने निसार उस के पहलू में।

शेर 9 — इंतज़ार का फल #09 / 15

जलाई थी जो शब भर राह में उम्मीद की शमएँ, चमक उठा वही रौशन शरार उस के पहलू में।

शेर 10 — दूर रहकर भी क़रीब #10 / 15

हवा छू कर जो आई थी मिरे महबूब के दर को, लिया उस का भी हम ने कुछ उधार उस के पहलू में।

शेर 11 — मिलने की ख़ुशी #11 / 15

मुकम्मल हो गईं सारी दुआएँ इल्तिजाएँ भी, रहा जब तक मिरी जाँ का मदार उस के पहलू में।

शेर 12 — बिना कहे समझ लेना #12 / 15

बिना बोले ही समझे वो मिरे दिल की हर इक हसरत, सुनी हर इक दबी दिल की पुकार उस के पहलू में।

शेर 13 — वफ़ा का वादा #13 / 15

वफ़ादारी के रंगों से सजाई आरज़ू अपनी, रहा सर पर मिरे अहद-ए-सवार उस के पहलू में।

शेर 14 — जुदाई का हल्का ख़ौफ़ #14 / 15

जुदा होने के अंदेशे से भी आँखें छलक आईं, छुपाये लाख आँसू थे हज़ार उस के पहलू में।

शेर 15 — मक़ता (तख़ल्लुस: अफ़सर) #15 / 15

रहा ‘अफ़सर’ मिरा दिल भी सदा पाकीज़ा जज़्बों से, लुटाया इश्क़ का सारा ख़ुमार उस के पहलू में।

شعر ۱ — مطلع #01 / 15

ملا ہے دل کو یوں آ کر قرار اس کے پہلو میں، ہوئی بیدار پھر سے اک بہار اس کے پہلو میں۔

شعر ۲ — پہلی ملاقات #02 / 15

وہ پہلی دید کی لذت ابھی تک یاد ہے دل کو، چھلکتا ہی رہا میٹھا خمار اس کے پہلو میں۔

شعر ۳ — آنکھوں کی محبت #03 / 15

نگاہوں سے نگاہوں نے ہزاروں داستاں کہہ دیں، ملا جب بھی ہمیں حسنِ نکھار اس کے پہلو میں۔

شعر ۴ — دل میں بسی یاد #04 / 15

زمانہ بھول کر ہم نے بسر کی زندگی ساری، حسیں لمحے کیے سارے گزار اس کے پہلو میں۔

شعر ۵ — خاموش محبت #05 / 15

جہاں پر لفظ خاموشی کی چادر اوڑھ لیتے ہیں، بسایا عشق نے اپنا دیار اس کے پہلو میں۔

شعر ۶ — پریم میں سکون #06 / 15

بھٹکتی روح کو آخر پناہِ زندگی بخشی، سکونِ جاں ہوا جب آشکار اس کے پہلو میں۔

شعر ۷ — دل کی دھڑکن #07 / 15

دھڑکتا ہے مرا دل بھی اسی کے سر میں اب ہر پل، ہوئیں سانسیں مری جاں بے شمار اس کے پہلو میں۔

شعر ۸ — خاص انسان کی چاہت #08 / 15

دو عالم کی خوشی جس پر لٹانے کی تمنا تھی، کیا سب کچھ وہی دل نے نثار اس کے پہلو میں۔

شعر ۹ — انتظار کا پھل #09 / 15

جلائی تھی جو شب بھر راہ میں امید کی شمعیں، چمک اٹھا وہی روشن شرار اس کے پہلو میں۔

شعر ۱۰ — دور رہ کر قریب #10 / 15

ہوا چھو کر جو آئی تھی مرے محبوب کے در کو، لیا اس کا بھی ہم نے کچھ ادھار اس کے پہلو میں۔

شعر ۱۱ — ملنے کی خوشی #11 / 15

مکمل ہو گئیں ساری دعائیں التجائیں بھی، رہا جب تک مری جاں کا مدار اس کے پہلو میں۔

شعر ۱۲ — بنا کہے سمجھ لینا #12 / 15

بنا بولے ہی سمجھے وہ مرے دل کی ہر اک حسرت، سنی ہر اک دبی دل کی پکار اس کے پہلو میں۔

شعر ۱۳ — وفا کا وعدہ #13 / 15

وفاداری کے رنگوں سے سجائی آرزو اپنی، رہا سر پر مرے عہدِ سوار اس کے پہلو میں۔

شعر ۱۴ — جدائی کا خوف #14 / 15

جدا ہونے کے اندیشے سے بھی آنکھیں چھلک آئیں، چھپائے لاکھ آنسو تھے ہزار اس کے پہلو میں۔

شعر ۱۵ — مقطع (تخلص: افسر) #15 / 15

رہا ’افسر‘ مرا دل بھی سدا پاکیزہ جذبوں سے، لٹایا عشق کا سارا خمار اس کے پہلو میں۔

Sher 1 — Matla #01 / 15

Mila hai dil ko yun aa kar qaraar us ke pehloo mein, Hui bedaar phir se ik bahaar us ke pehloo mein.

Sher 2 — Pehli Mulaqaat #02 / 15

Wo pehli deed ki lazzat abhi tak yaad hai dil ko, Chhalakta hi raha meetha khumaar us ke pehloo mein.

Sher 3 — Aankhon Ki Mohabbat #03 / 15

Nigaahon se nigaahon ne hazaaron daastaan keh deen, Mila jab bhi humein husn-e-nikhaar us ke pehloo mein.

Sher 4 — Dil Mein Basi Yaad #04 / 15

Zamaana bhool kar hum ne basar ki zindagi saari, Haseen lamhe kiye saare guzaar us ke pehloo mein.

Sher 5 — Khamosh Mohabbat #05 / 15

Jahaan par lafz khaamoshi ki chaadar odh lete hain, Basaaya ishq ne apna dayaar us ke pehloo mein.

Sher 6 — Prem Mein Sukoon #06 / 15

Bhatakti rooh ko aakhir panaah-e-zindagi bakhshi, Sukoon-e-jaan hua jab aashkaar us ke pehloo mein.

Sher 7 — Dil Ki Dhadkan #07 / 15

Dhadakta hai mira dil bhi usi ke sur mein ab har pal, Hueen saansein miri jaan be-shumaar us ke pehloo mein.

Sher 8 — Khas Insan Ki Chahat #08 / 15

Do aalam ki khushi jis par lutaane ki tamanna thi, Kiya sab kuch wahi dil ne nisaar us ke pehloo mein.

Sher 9 — Intezaar Ka Phal #09 / 15

Jalaayi thi jo shab bhar raah mein umeed ki shama-ein, Chamak utha wahi raushan sharaar us ke pehloo mein.

Sher 10 — Door Rehkar Kareeb #10 / 15

Hawa chhoo kar jo aayi thi mire mehboob ke dar ko, Liya us ka bhi hum ne kuch udhaar us ke pehloo mein.

Sher 11 — Milne Ki Khushi #11 / 15

Mukammal ho gayeen saari duayein iltijayein bhi, Raha jab tak miri jaan ka madaar us ke pehloo mein.

Sher 12 — Bina Kahe Samajhna #12 / 15

Bina bole hi samjhe wo mire dil ki har ik hasrat, Suni har ik dabi dil ki pukaar us ke pehloo mein.

Sher 13 — Wafa Ka Waada #13 / 15

Wafaadaari ke rangon se sajaayi aarzoo apni, Raha sar par mire ahad-e-sawaar us ke pehloo mein.

Sher 14 — Judai Ka Khauf #14 / 15

Juda hone ke andeshe se bhi aankhein chhalak aayeen, Chhupaaye laakh aansoo the hazaar us ke pehloo mein.

Sher 15 — Maqta (Takhallus: Afsar) #15 / 15

Raha ‘Afsar’ mira dil bhi sada paakeeza jazbon se, Lutaaya ishq ka saara khumaar us ke pehloo mein.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

मोहब्बत भरी ग़ज़ल वह काव्यात्मक रचना है जिसमें इश्क़ की पाकीज़गी, महबूब के हुस्न, पहली मुलाक़ात के सुरूर, वफ़ा और दिल के कोमल जज़्बातों को शास्त्रीय बहर और रदीफ़-क़ाफ़िया में पिरोया जाता है।
पारंपरिक शायरी में 15 अशआर (30 पंक्तियाँ) की ग़ज़ल एक मुकम्मल और विस्तृत साहित्यिक रचना मानी जाती है, जिसमें शायर प्रेम के अलग-अलग 15 रंगों को एक ही बहर में विस्तार से बयां करता है।
इस ग़ज़ल का पहला शेर मतला है, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया 'क़रार/बहार' और रदीफ़ 'के पहलू में' का खूबसूरत निर्वाह हुआ है।
ग़ज़ल के आख़िरी शेर को मक़ता कहते हैं जिसमें शायर अपना उपनाम इस्तेमाल करता है। इस ग़ज़ल के 15वें शेर में 'अफ़सर' (Afsar) तख़ल्लुस का प्रयोग किया गया है।
रदीफ़ वह शब्द या वाक्यांश है जो हर शेर के अंत में ज्यों का त्यों दोहराया जाता है (जैसे: 'के पहलू में')। क़ाफ़िया वह तुकांत शब्द है जो रदीफ़ से पहले आकर हर शेर में बदलता है (जैसे: क़रार, बहार, ख़ुमार)।
जी हाँ, आप इस ग़ज़ल के किसी भी शेर को या पूरी ग़ज़ल को कॉपी करके सीधे अपने WhatsApp स्टेटस, Instagram स्टोरी या फोटो कैप्शन में साझा कर सकते हैं।
दोनों का व्याकरण, बहर, वज़्न और मीटर एक समान होता है। मुख्य अंतर केवल लिपि (देवनागरी बनाम नस्तलीक़) और शब्दों के चयन का होता है।
पेज पर दिए गए 'Copy Full Ghazal' बटन पर क्लिक करके आप चयनित भाषा (हिंदी, उर्दू या Hinglish) की पूरी 15 अशआर ग़ज़ल एक साथ कॉपी कर सकते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

सच्चा प्रेम केवल अल्फ़ाज़ों का मोहताज नहीं होता, लेकिन जब वह शास्त्रीय बहर और संजीदा लफ़्ज़ों में ढलता है तो सदियों तक अमर हो जाता है। यह Mohabbat Bhari Ghazal मतला से लेकर मक़ता (तख़ल्लुस ‘अफ़सर’) तक इश्क़ के समर्पण, पहली मुलाक़ात के सुरूर, ख़ामोश बातों और वफ़ा के पाकीज़ा अहसासों का एक मुकम्मल आईना है। हज़ज मुसम्मद सालिम की मीठी लयबद्धता इस रचना को पढ़ने में अत्यंत सुकून और रूमानियत बख़्शती है। हमें पूरी उम्मीद है कि 30 मिसरों की यह संपूर्ण रोमांटिक ग़ज़ल आपके दिल के तारों को ज़रूर झंकृत कर गई होगी। आपको इसका कौन सा शेर सबसे ज़्यादा पसंद आया, नीचे कमेंट करके अपनी राय ज़रूर दें और इसे अपने अज़ीज़ दोस्तों व प्यार के साथ साझा करें!

No comments:

Post a Comment

Bottom Ad [Post Page]

Advertisement